
स्तोत्र ग्रन्थ · IRV-HI
स्तोत्र ग्रन्थ
103
बाइबल पाठकृत्रिम आवाज़ (AI)
दाऊद का भजन हे मेरे मन, यहोवा को धन्य कह; और जो कुछ मुझ में है, वह उसके पवित्र नाम को धन्य कहे! यह भी देखें: स्तोत्र ग्रन्थ 146:1-2स्तोत्र ग्रन्थ 57:7-111 कुरिन्थियों 14:15हे मेरे मन, यहोवा को धन्य कह, और उसके किसी उपकार को न भूलना। यह भी देखें: यशायाह 63:7स्तोत्र ग्रन्थ 116:12स्तोत्र ग्रन्थ 105:5वही तो तेरे सब अधर्म को क्षमा करता, और तेरे सब रोगों को चंगा करता है, यह भी देखें: निर्गमन 15:26यशायाह 53:5यिर्मयाह 17:14वही तो तेरे प्राण को नाश होने से बचा लेता है, और तेरे सिर पर करुणा और दया का मुकुट बाँधता है, यह भी देखें: स्तोत्र ग्रन्थ 56:13स्तोत्र ग्रन्थ 71:23स्तोत्र ग्रन्थ 103:12वही तो तेरी लालसा को उत्तम पदार्थों से तृप्त करता है, जिससे तेरी जवानी उकाब के समान नई हो जाती है। यह भी देखें: यशायाह 40:31स्तोत्र ग्रन्थ 107:91 तीमुथियुस 6:17यहोवा सब पिसे हुओं के लिये धर्म और न्याय के काम करता है। यह भी देखें: स्तोत्र ग्रन्थ 12:5स्तोत्र ग्रन्थ 9:9नीतिवचन 14:31उसने मूसा को अपनी गति, और इस्राएलियों पर अपने काम प्रगट किए। (भज. 147:19) यह भी देखें: निर्गमन 33:13स्तोत्र ग्रन्थ 147:19स्तोत्र ग्रन्थ 78:11यहोवा दयालु और अनुग्रहकारी, विलम्ब से कोप करनेवाला और अति करुणामय है (भज. 86:15, भज. 145:8) यह भी देखें: स्तोत्र ग्रन्थ 86:15योएल 2:13निर्गमन 34:6-7वह सर्वदा वाद-विवाद करता न रहेगा, न उसका क्रोध सदा के लिये भड़का रहेगा। यह भी देखें: यशायाह 57:16स्तोत्र ग्रन्थ 30:5मीका 7:18-19उसने हमारे पापों के अनुसार हम से व्यवहार नहीं किया, और न हमारे अधर्म के कामों के अनुसार हमको बदला दिया है। यह भी देखें: एज्रा 9:13नहेम्याह 9:31विलापगीत 3:22जैसे आकाश पृथ्वी के ऊपर ऊँचा है, वैसे ही उसकी करुणा उसके डरवैयों के ऊपर प्रबल है। यह भी देखें: स्तोत्र ग्रन्थ 57:10लूकस 1:50स्तोत्र ग्रन्थ 103:17उदयाचल अस्ताचल से जितनी दूर है, उसने हमारे अपराधों को हम से उतनी ही दूर कर दिया है। यह भी देखें: यशायाह 43:251 योहन 1:7मीका 7:18जैसे पिता अपने बालकों पर दया करता है, वैसे ही यहोवा अपने डरवैयों पर दया करता है। यह भी देखें: लूकस 11:11-12इब्रानियों 12:5-11लूकस 15:21-22क्योंकि वह हमारी सृष्टि जानता है; और उसको स्मरण रहता है कि मनुष्य मिट्टी ही है। यह भी देखें: सभोपदेशक 12:7अय्यूब 10:9स्तोत्र ग्रन्थ 78:38-39मनुष्य की आयु घास के समान होती है, वह मैदान के फूल के समान फूलता है, यह भी देखें: 1 पतरस 1:24याकूब 1:10-11यशायाह 51:12जो पवन लगते ही ठहर नहीं सकता, और न वह अपने स्थान में फिर मिलता है। यह भी देखें: यशायाह 40:7अय्यूब 20:9अय्यूब 14:10परन्तु यहोवा की करुणा उसके डरवैयों पर युग-युग, और उसका धर्म उनके नाती-पोतों पर भी प्रगट होता रहता है, (लूका 1:50) यह भी देखें: स्तोत्र ग्रन्थ 100:5इफिसियों 2:4-72 तीमुथियुस 1:9अर्थात् उन पर जो उसकी वाचा का पालन करते और उसके उपदेशों को स्मरण करके उन पर चलते हैं। यह भी देखें: व्यवस्थाविवरण 7:9लूकस 1:6स्तोत्र ग्रन्थ 132:12यहोवा ने तो अपना सिंहासन स्वर्ग में स्थिर किया है, और उसका राज्य पूरी सृष्टि पर है। यह भी देखें: स्तोत्र ग्रन्थ 47:2फिलिप्पियों 2:9-10स्तोत्र ग्रन्थ 9:7हे यहोवा के दूतों, तुम जो बड़े वीर हो, और उसके वचन को मानते और पूरा करते हो, उसको धन्य कहो! यह भी देखें: इब्रानियों 1:14स्तोत्र ग्रन्थ 148:2लूकस 1:19हे यहोवा की सारी सेनाओं, हे उसके सेवकों, तुम जो उसकी इच्छा पूरी करते हो, उसको धन्य कहो! यह भी देखें: 1 राजाओं 22:19नहेम्याह 9:6लूकस 2:13हे यहोवा की सारी सृष्टि, उसके राज्य के सब स्थानों में उसको धन्य कहो। हे मेरे मन, तू यहोवा को धन्य कह! यह भी देखें: यशायाह 42:10-12यशायाह 49:13स्तोत्र ग्रन्थ 145:10
यह भी देखें: क्रॉस-संदर्भ OpenBible.info (CC BY) से, आंशिक रूप से Treasury of Scripture Knowledge (सार्वजनिक डोमेन) पर आधारित।
मनन
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टिप्पणियाँ · हेडॉक (1859, सार्वजनिक डोमेन)14 टिप्पणियाँ
टिप्पणियाँ अंग्रेज़ी में फ़ा. जॉर्ज लियो हेडॉक की 19वीं सदी की काथलिक टीका, जैसी प्रकाशित हुई।
डुए-रीम्स क्रमांकन: भजन 102
ये टिप्पणियाँ अपने समय के विवादों को बनाए रखती हैं: कुछ यहूदी लोगों या अन्य ख्रीस्तीयों के बारे में कठोरता से बोलती हैं। आज कलीसिया कुछ और सिखाती है: ख्रीस्त की मृत्यु के लिए यहूदी लोगों को दोषी नहीं ठहराया जा सकता (नोस्त्रा एताते 4; धर्मशिक्षा 597–598), और अन्य समुदायों के ख्रीस्तीय प्रभु में हमारे भाई-बहन हैं (उनितातिस रेदिन्तेग्रात्सियो 3)। ख्रीस्तीय एकता
अध्याय का परिचय
PSALM CII. (BENEDIC ANIMA.)
Thanksgiving to God for his mercies.
स्तोत्र ग्रन्थ 102:1
Ver. 1. Himself. All agree that David wrote this psalm as a model of resignation.
The occasion is not known. Bert. --- It may express the sentiments of the captives, (C.) or of converts to Christianity, (Euseb.) and is written with inimitable sweetness.
↑ 1स्तोत्र ग्रन्थ 102:3
Ver. 3. Diseases. He had described captivity as an illness. Ps. ci. C. --- God graciously forgives sin, and removes bad habits. He preserves us from falling, and grants us the victory, with all our reasonable requests. W.
↑ 3स्तोत्र ग्रन्थ 102:5
Ver. 5. Eagle's. Which get fresh feathers every year, like other birds. Is. xl. 31.
C. --- The eagle retains its vigour for a long time, (H.) though many fabulous accounts have been given of its renovation. Bert. --- The new birth in baptism, (Theod.) or by faith, (Euseb.) or the resurrection of Christ are thus insinuated, (S. Leo, ser. i.) as well as (H.) our resurrection and state of grace.
The one is necessarily connected with the other, and both senses are good. W.
↑ 5स्तोत्र ग्रन्थ 102:6
Ver. 6. Mercies. Heb. "Justice" in protecting the innocent.
↑ 6स्तोत्र ग्रन्थ 102:9
Ver. 9. Ever. He executes his threats, but soon pardons us. C. --- Heb. "he will not plead always, nor watch to surprise us for ever;" (C.) or "retain" his anger.
Bert. --- He is inclined to pity us, and only inflicts a temporal punishment on the penitent, as Christ has paid their ransom. W.
↑ 9स्तोत्र ग्रन्थ 102:10
Ver. 10. Iniquities. Which deserved eternal reprobation.
↑ 10स्तोत्र ग्रन्थ 102:11
Ver. 11. Earth. There is no proportion between God's mercy and our crimes. C.
--- Sins are perfectly washed away, (W.) and not barely covered, as the east cannot be the west. Bert. --- Sin remitted "sets for ever." S. Aug.
↑ 11स्तोत्र ग्रन्थ 102:14
Ver. 14. He remembereth. Rom. Sept. and psalter, &c. "Remember." Other copies agree with us.
C. --- God compassionates the frailty of those who fear him. Origen falsely inferred from v. 9.
that the devils and the damned would one day be saved. But this is contrary to Scripture. v. 17.
Matt. xxv. Apoc. xx. &c. W.
↑ 14स्तोत्र ग्रन्थ 102:16
Ver. 16. In him. Or "over it;" the flower. Or the spirit of God's indignation will overwhelm him.
The soul of man departs, and cannot naturally be reunited with the body, though it greatly desire that union. C. --- The longest life is but like the duration of a flower, (Is. xl. 6. H.) and the splendour of the noblest families is not better in the sight of God. S. Aug.
↑ 16स्तोत्र ग्रन्थ 102:17
Ver. 17. Justice. In protecting the oppressed, (C.) and rendering to every one according to his deserts abundantly. H. --- God never punishes more than a person's crimes have merited. Ex. xx.
5. and xxxiv. 6. C.
↑ 17स्तोत्र ग्रन्थ 102:19
Ver. 19. All. When Christ shall sit in judgment, (Bert.) and the wicked be suffered no longer to disturb the order of things, and the joy of the elect. H.
↑ 19स्तोत्र ग्रन्थ 102:20
Ver. 20. His angels. You who have executed the orders of God for our delivery, help us to return him thanks. C. --- Hearkening. Lit. "to hear," (H.) or that all may learn to obey God's mandates when they perceive how carefully the angels put them in execution. Bert.
↑ 20स्तोत्र ग्रन्थ 102:21
Ver. 21. Hosts. Sun, &c. which never deviate from their regular course.
↑ 21स्तोत्र ग्रन्थ 102:22
Ver. 22. Soul. In vain should we behold all nature praising God, if we neglected that duty. Bert.
--- All the works of the Most High praise him, being under his dominion. W.
↑ 22लाइसेंस: Notes by Fr. George Leo Haydock (1774–1849), from the Douay-Rheims Bible with Haydock's commentary (first ed. Thomas Haydock, Manchester/Dublin, 1811–1814; New York: Edward Dunigan & Brother, 1859); New Testament notes compiled with Fr. Benedict Rayment. Public domain. Digital text: "The Haydock Bible", Internet Archive (archive.org/details/TheHaydockBible), uploaded 2011 under the Public Domain Mark. · आभार और लाइसेंस