
2 इतिहास · IRV-HI
2 इतिहास
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बाइबल पाठकृत्रिम आवाज़ (AI)
तब सुलैमान कहने लगा, “यहोवा ने कहा था, कि मैं घोर अंधकार में वास किए रहूँगा। यह भी देखें: निर्गमन 20:21स्तोत्र ग्रन्थ 18:8-11लैव्यव्यवस्था 16:2परन्तु मैंने तेरे लिये एक वासस्थान वरन् ऐसा दृढ़ स्थान बनाया है, जिसमें तू युग-युग रहे।” (भज. 132:13,14) यह भी देखें: 2 इतिहास 2:4-61 इतिहास 17:12स्तोत्र ग्रन्थ 132:5तब राजा ने इस्राएल की पूरी सभा की ओर मुँह फेरकर उसको आशीर्वाद दिया, और इस्राएल की पूरी सभा खड़ी रही। यह भी देखें: 1 राजाओं 8:14मत्ती 13:2यहोशू 22:6और उसने कहा, “धन्य है इस्राएल का परमेश्वर यहोवा, जिसने अपने मुँह से मेरे पिता दाऊद को यह वचन दिया था, और अपने हाथों से इसे पूरा किया है, यह भी देखें: स्तोत्र ग्रन्थ 72:18-19मत्ती 24:35स्तोत्र ग्रन्थ 68:32-35‘जिस दिन से मैं अपनी प्रजा को मिस्र देश से निकाल लाया, तब से मैंने न तो इस्राएल के किसी गोत्र का कोई नगर चुना जिसमें मेरे नाम के निवास के लिये भवन बनाया जाए, और न कोई मनुष्य चुना कि वह मेरी प्रजा इस्राएल पर प्रधान हो। यह भी देखें: 1 शमूएल 10:242 शमूएल 7:15-16दानिय्येल 9:19परन्तु मैंने यरूशलेम को इसलिए चुना है, कि मेरा नाम वहाँ हो, और दाऊद को चुन लिया है कि वह मेरी प्रजा इस्राएल पर प्रधान हो।’ यह भी देखें: स्तोत्र ग्रन्थ 132:131 इतिहास 28:42 इतिहास 12:13मेरे पिता दाऊद की यह इच्छा थी कि इस्राएल के परमेश्वर यहोवा के नाम का एक भवन बनवाए। यह भी देखें: 1 इतिहास 17:11 राजाओं 5:31 इतिहास 22:7परन्तु यहोवा ने मेरे पिता दाऊद से कहा, ‘तेरी जो इच्छा है कि यहोवा के नाम का एक भवन बनाए, ऐसी इच्छा करके तूने भला तो किया; (1 राजा. 8:18) यह भी देखें: 1 राजाओं 8:18-21मारकुस 14:82 कुरिन्थियों 8:12तो भी तू उस भवन को बनाने न पाएगा: तेरा जो निज पुत्र होगा, वही मेरे नाम का भवन बनाएगा।’ यह भी देखें: 1 इतिहास 17:11-121 इतिहास 17:42 शमूएल 7:12-13यह वचन जो यहोवा ने कहा था, उसे उसने पूरा भी किया है; और मैं अपने पिता दाऊद के स्थान पर उठकर यहोवा के वचन के अनुसार इस्राएल की गद्दी पर विराजमान हूँ, और इस्राएल के परमेश्वर यहोवा के नाम के इस भवन को बनाया है। (1 राजा. 2:12) यह भी देखें: 1 इतिहास 29:151 इतिहास 28:51 इतिहास 17:11इसमें मैंने उस सन्दूक को रख दिया है, जिसमें यहोवा की वह वाचा है, जो उसने इस्राएलियों से बाँधी थी।” यह भी देखें: 2 इतिहास 5:102 इतिहास 5:7निर्गमन 40:20तब वह इस्राएल की सारी सभा के देखते यहोवा की वेदी के सामने खड़ा हुआ और अपने हाथ फैलाए। यह भी देखें: यशायाह 50:10स्तोत्र ग्रन्थ 63:4निर्गमन 9:33सुलैमान ने पाँच हाथ लम्बी, पाँच हाथ चौड़ी और तीन हाथ ऊँची पीतल की एक चौकी बनाकर आँगन के बीच रखवाई थी; उसी पर खड़े होकर उसने सारे इस्राएल की सभा के सामने घुटने टेककर स्वर्ग की ओर हाथ फैलाए हुए कहा, यह भी देखें: 1 राजाओं 8:54नहेम्याह 8:4एज्रा 9:5“हे यहोवा, हे इस्राएल के परमेश्वर, तेरे समान न तो स्वर्ग में और न पृथ्वी पर कोई परमेश्वर है: तेरे जो दास अपने सारे मन से अपने को तेरे सम्मुख जानकर चलते हैं, उनके लिये तू अपनी वाचा पूरी करता और करुणा करता रहता है। यह भी देखें: निर्गमन 15:11व्यवस्थाविवरण 7:9नहेम्याह 1:5तूने जो वचन मेरे पिता दाऊद को दिया था, उसका तूने पालन किया है; जैसा तूने अपने मुँह से कहा था, वैसा ही अपने हाथ से उसको हमारी आँखों के सामने पूरा भी किया है। यह भी देखें: 1 इतिहास 22:9-102 शमूएल 7:121 राजाओं 8:24इसलिए अब हे इस्राएल के परमेश्वर यहोवा, इस वचन को भी पूरा कर, जो तूने अपने दास मेरे पिता दाऊद को दिया था, ‘तेरे कुल में मेरे सामने इस्राएल की गद्दी पर विराजनेवाले सदा बने रहेंगे, यह हो कि जैसे तू अपने को मेरे सम्मुख जानकर चलता रहा, वैसे ही तेरे वंश के लोग अपनी चाल चलन में ऐसी चौकसी करें, कि मेरी व्यवस्था पर चलें।’ यह भी देखें: 1 राजाओं 2:4स्तोत्र ग्रन्थ 132:12योहन 15:14-15अब हे इस्राएल के परमेश्वर यहोवा, जो वचन तूने अपने दास दाऊद को दिया था, वह सच्चा किया जाए। यह भी देखें: यिर्मयाह 11:52 शमूएल 7:25-292 इतिहास 6:4“परन्तु क्या परमेश्वर सचमुच मनुष्यों के संग पृथ्वी पर वास करेगा? स्वर्ग में वरन् सबसे ऊँचे स्वर्ग में भी तू नहीं समाता, फिर मेरे बनाए हुए इस भवन में तू कैसे समाएगा? यह भी देखें: 2 इतिहास 2:6यशायाह 66:1स्तोत्र ग्रन्थ 139:7-10तो भी हे मेरे परमेश्वर यहोवा, अपने दास की प्रार्थना और गिड़गिड़ाहट की ओर ध्यान दे और मेरी पुकार और यह प्रार्थना सुन, जो मैं तेरे सामने कर रहा हूँ। यह भी देखें: 1 राजाओं 8:28स्तोत्र ग्रन्थ 130:2स्तोत्र ग्रन्थ 20:1-3वह यह है कि तेरी आँखें इस भवन की ओर, अर्थात् इसी स्थान की ओर जिसके विषय में तूने कहा है कि मैं उसमें अपना नाम रखूँगा, रात-दिन खुली रहें, और जो प्रार्थना तेरा दास इस स्थान की ओर करे, उसे तू सुन ले। यह भी देखें: स्तोत्र ग्रन्थ 34:15स्तोत्र ग्रन्थ 121:52 इतिहास 6:6और अपने दास, और अपनी प्रजा इस्राएल की प्रार्थना जिसको वे इस स्थान की ओर मुँह किए हुए गिड़गिड़ाकर करें, उसे सुन लेना; स्वर्ग में से जो तेरा निवास-स्थान है, सुन लेना; और सुनकर क्षमा करना। यह भी देखें: मीका 7:18यशायाह 43:25दानिय्येल 9:19“जब कोई मनुष्य किसी दूसरे के विरुद्ध अपराध करे और उसको शपथ खिलाई जाए, और वह आकर इस भवन में तेरी वेदी के सामने शपथ खाए, यह भी देखें: निर्गमन 22:11मत्ती 23:18लैव्यव्यवस्था 5:1तब तू स्वर्ग में से सुनना और मानना, और अपने दासों का न्याय करके दुष्ट को बदला देना, और उसकी चाल उसी के सिर लौटा देना, और निर्दोष को निर्दोष ठहराकर, उसकी धार्मिकता के अनुसार उसको फल देना। यह भी देखें: यहेजकेल 18:20यशायाह 3:10-11यिर्मयाह 51:56“फिर यदि तेरी प्रजा इस्राएल तेरे विरुद्ध पाप करने के कारण अपने शत्रुओं से हार जाए, और तेरी ओर फिरकर तेरा नाम मानें, और इस भवन में तुझ से प्रार्थना करें और गिड़गिड़ाएँ, यह भी देखें: लैव्यव्यवस्था 26:17व्यवस्थाविवरण 4:29-31व्यवस्थाविवरण 28:25तो तू स्वर्ग में से सुनना; और अपनी प्रजा इस्राएल का पाप क्षमा करना, और उन्हें इस देश में लौटा ले आना जिसे तूने उनको और उनके पुरखाओं को दिया है। यह भी देखें: यिर्मयाह 33:6-13एज्रा 1:1-6यहोशू 21:43“जब वे तेरे विरुद्ध पाप करें, और इस कारण आकाश इतना बन्द हो जाए कि वर्षा न हो, ऐसे समय यदि वे इस स्थान की ओर प्रार्थना करके तेरे नाम को मानें, और तू जो उन्हें दुःख देता है, इस कारण वे अपने पाप से फिरें, यह भी देखें: लैव्यव्यवस्था 26:19व्यवस्थाविवरण 28:23व्यवस्थाविवरण 11:17तो तू स्वर्ग में से सुनना, और अपने दासों और अपनी प्रजा इस्राएल के पाप को क्षमा करना; तू जो उनको वह भला मार्ग दिखाता है जिस पर उन्हें चलना चाहिये, इसलिए अपने इस देश पर जिसे तूने अपनी प्रजा का भाग करके दिया है, पानी बरसा देना। यह भी देखें: यिर्मयाह 5:24जकर्याह 10:11 राजाओं 8:35-36“जब इस देश में अकाल या मरी या झुलस हो या गेरुई या टिड्डियाँ या कीड़े लगें, या उनके शत्रु उनके देश के फाटकों में उन्हें घेर रखें, या कोई विपत्ति या रोग हो; यह भी देखें: रूत 1:1प्रकाशितवाक्य 9:3-11योएल 2:25तब यदि कोई मनुष्य या तेरी सारी प्रजा इस्राएल जो अपना-अपना दुःख और अपना-अपना खेद जानकर और गिड़गिड़ाहट के साथ प्रार्थना करके अपने हाथ इस भवन की ओर फैलाएँ; यह भी देखें: नीतिवचन 14:10स्तोत्र ग्रन्थ 142:1-2स्तोत्र ग्रन्थ 33:12-13तो तू अपने स्वर्गीय निवास-स्थान से सुनकर क्षमा करना, और एक-एक के मन की जानकर उसकी चाल के अनुसार उसे फल देना; (तू ही तो आदमियों के मन का जाननेवाला है); यह भी देखें: 1 इतिहास 28:91 शमूएल 16:7प्रकाशितवाक्य 2:23कि वे जितने दिन इस देश में रहें, जिसे तूने उनके पुरखाओं को दिया था, उतने दिन तक तेरा भय मानते हुए तेरे मार्गों पर चलते रहें। यह भी देखें: 1 शमूएल 12:24स्तोत्र ग्रन्थ 128:1अय्यूब 28:28“फिर परदेशी भी जो तेरी प्रजा इस्राएल का न हो, जब वह तेरे बड़े नाम और बलवन्त हाथ और बढ़ाई हुई भुजा के कारण दूर देश से आए, और आकर इस भवन की ओर मुँह किए हुए प्रार्थना करे, यह भी देखें: यशायाह 56:3-71 राजाओं 8:41-43मत्ती 8:10-11तब तू अपने स्वर्गीय निवास-स्थान में से सुने, और जिस बात के लिये ऐसा परदेशी तुझे पुकारे, उसके अनुसार करना; जिससे पृथ्वी के सब देशों के लोग तेरा नाम जानकर, तेरी प्रजा इस्राएल के समान तेरा भय मानें; और निश्चय करें, कि यह भवन जो मैंने बनाया है, वह तेरा ही कहलाता है। यह भी देखें: 2 इतिहास 7:14यिर्मयाह 10:7यशायाह 54:1-3“जब तेरी प्रजा के लोग जहाँ कहीं तू उन्हें भेजे वहाँ अपने शत्रुओं से लड़ाई करने को निकल जाएँ, और इस नगर की ओर जिसे तूने चुना है, और इस भवन की ओर जिसे मैंने तेरे नाम का बनाया है, मुँह किए हुए तुझ से प्रार्थना करें, यह भी देखें: 2 इतिहास 20:6-13यहोशू 1:2-52 इतिहास 14:9-12तब तू स्वर्ग में से उनकी प्रार्थना और गिड़गिड़ाहट सुनना, और उनका न्याय करना। यह भी देखें: स्तोत्र ग्रन्थ 9:3-4यिर्मयाह 5:28यशायाह 37:21-36“निष्पाप तो कोई मनुष्य नहीं है यदि वे भी तेरे विरुद्ध पाप करें और तू उन पर कोप करके उन्हें शत्रुओं के हाथ कर दे, और वे उन्हें बन्दी बनाकर किसी देश को, चाहे वह दूर हो, चाहे निकट, ले जाएँ, यह भी देखें: 1 योहन 1:8-10सभोपदेशक 7:20याकूब 3:2तो यदि वे बँधुआई के देश में सोच विचार करें, और फिरकर अपने बन्दी बनानेवालों के देश में तुझ से गिड़गिड़ाकर कहें, ‘हमने पाप किया, और कुटिलता और दुष्टता की है,’ यह भी देखें: यिर्मयाह 31:18-20यशायाह 64:6-12दानिय्येल 9:5-11इसलिए यदि वे अपनी बँधुआई के देश में जहाँ वे उन्हें बन्दी बनाकर ले गए हों अपने पूरे मन और सारे जीव से तेरी ओर फिरें, और अपने इस देश की ओर जो तूने उनके पुरखाओं को दिया था, और इस नगर की ओर जिसे तूने चुना है, और इस भवन की ओर जिसे मैंने तेरे नाम का बनाया है, मुँह किए हुए तुझ से प्रार्थना करें, यह भी देखें: योएल 2:12-13दानिय्येल 9:3-4व्यवस्थाविवरण 30:2-6तो तू अपने स्वर्गीय निवास-स्थान में से उनकी प्रार्थना और गिड़गिड़ाहट सुनना, और उनका न्याय करना और जो पाप तेरी प्रजा के लोग तेरे विरुद्ध करें, उन्हें क्षमा करना। यह भी देखें: स्तोत्र ग्रन्थ 25:18मीका 7:18-202 इतिहास 6:35और हे मेरे परमेश्वर! जो प्रार्थना इस स्थान में की जाए उसकी ओर अपनी आँखें खोले रह और अपने कान लगाए रख। यह भी देखें: 2 इतिहास 7:15स्तोत्र ग्रन्थ 116:2स्तोत्र ग्रन्थ 17:1“अब हे यहोवा परमेश्वर, उठकर अपने सामर्थ्य के सन्दूक समेत अपने विश्रामस्थान में आ, हे यहोवा परमेश्वर तेरे याजक उद्धाररूपी वस्त्र पहने रहें, और तेरे भक्त लोग भलाई के कारण आनन्द करते रहें। यह भी देखें: यशायाह 61:101 इतिहास 28:2प्रकाशितवाक्य 19:8हे यहोवा परमेश्वर, अपने अभिषिक्त की प्रार्थना को अनसुनी न कर, तू अपने दास दाऊद पर की गई करुणा के काम स्मरण रख।” यह भी देखें: यशायाह 55:3स्तोत्र ग्रन्थ 132:11 राजाओं 1:34
यह भी देखें: क्रॉस-संदर्भ OpenBible.info (CC BY) से, आंशिक रूप से Treasury of Scripture Knowledge (सार्वजनिक डोमेन) पर आधारित।
मनन
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टिप्पणियाँ · हेडॉक (1859, सार्वजनिक डोमेन)12 टिप्पणियाँ
टिप्पणियाँ अंग्रेज़ी में फ़ा. जॉर्ज लियो हेडॉक की 19वीं सदी की काथलिक टीका, जैसी प्रकाशित हुई।
ये टिप्पणियाँ अपने समय के विवादों को बनाए रखती हैं: कुछ यहूदी लोगों या अन्य ख्रीस्तीयों के बारे में कठोरता से बोलती हैं। आज कलीसिया कुछ और सिखाती है: ख्रीस्त की मृत्यु के लिए यहूदी लोगों को दोषी नहीं ठहराया जा सकता (नोस्त्रा एताते 4; धर्मशिक्षा 597–598), और अन्य समुदायों के ख्रीस्तीय प्रभु में हमारे भाई-बहन हैं (उनितातिस रेदिन्तेग्रात्सियो 3)। ख्रीस्तीय एकता
2 इतिहास 6:1
Ver. 1. Cloud: lit. "darkness." H. --- The promise had been made to Moses. Ex.
xvi. 10. and xl 32. C. --- God thus manifested his presence. W.
↑ 12 इतिहास 6:12
Ver. 12. Hands. Such external gestures promote attention in prayer; and hence were much used by holy people, at all times. W.
↑ 122 इतिहास 6:13
Ver. 13. Scaffold, ( basim. ) The Heb. ( kiyor) is used for "a shell, ( concha. T.) or bowl," as the throne was probably of the same form, and was placed on a square pedestal, at the higher end of the court of the people, (C.) which is here styled the temple, (basilicæ) or "hall." C. iv. 9. Sept.
aules. Heb. chatsar, which denotes that great court where (H.) the body of the people stood bare-headed, before the Lord, (Grot. &c. C. xx. 5.) in the open air.
D. --- We are assured that the king himself never sat in his tribune. C. --- Others reserve that privilege to him alone. H. --- While he addressed the people, he turned towards them.
↑ 132 इतिहास 6:19
Ver. 19. End. Temples are erected for the convenience of men. C. --- Solomon hopes that God will reward his good intentions.
↑ 192 इतिहास 6:22
Ver. 22. Altar; thus solemnly consenting to be punished by God, if he swear falsely. H. --- This practice was not prescribed by the law, but took place when witnesses could not be procured, or when it was necessary to rely on the word of the accused.
↑ 222 इतिहास 6:28
Ver. 28. Blasting, or mildew, ( ærugo & aurugo. ) The first has the colour of brass, the other of gold. both have nearly the same import. M. --- One of the terms is rendered, corrupt air; (3 K.
viii. 37. C.) as this is one of the great causes why both plants and animals do not thrive. Sept.
"corruption of the air and king's evil, or yellow jaundice:" ikteros. H.
↑ 282 इतिहास 6:29
Ver. 29. Any. Heb. adds, "man, or thy people." Sept. "and ( that is) to thy." See v. 32. H. ---
Both strangers and Israelites may there sue for mercy, and obtain it. C. ---
From this chapter, as well as from many other passages, it is evident that places consecrated to God, are more acceptable to him than other places; (W.) and here the prayers of the faithful are sooner heard, as they testify their unity.
D.
↑ 292 इतिहास 6:31
Ver. 31. Fear thee, being filled with awe at the sight of thy judgments. C.
↑ 312 इतिहास 6:33
Ver. 33. House, that they may know that this is not only called, but is, in effect, the temple of the Lord, where he will display his power and goodness. H.
↑ 332 इतिहास 6:38
Ver. 38. Name. Hence arose the custom of turning towards Jerusalem and the temple, when the Jews poured for their supplications, in any country. 3 K. viii.
44.
↑ 382 इतिहास 6:41
Ver. 41. Now, therefore. This is taken from Ps. cxxxi. 8. 9. 10. (M.) almost word for word. We do not find that Solomon spoke this, 3 K. C. --- Place: lit. "rest."
H. --- Come, O Lord, and dwell here. --- Strength, by which thy wonders shine forth, and thy enemies are dismayed. The ark is styled the strength of Israel, Ps. lxxvii. 61. and lxii. 3.; and in the parallel passage we read, Thou and the ark of they sanctification, or sanctuary, which is its highest ornament, and which thou hast sanctified, or required to be treated with respect. --- Salvation, or justice, (Ps. cxxxi.) which is the surest method of obtaining happiness.
↑ 412 इतिहास 6:42
Ver. 42. Anointed. Cover not with shame the king, whom thou hast appointed, (H.) nor reject my prayer. T. --- Mercies, which thou hast shewn, or rather (C.) the acts of virtue which thy servant displayed. Syr. &c. For thy servant David's sake, turn not away the face of thy anointed. Ps.
cxxxi. In consideration of his merits, grant my request. C. --- Even Solomon, though at this time the object of God's complacency, disdains not to screen himself under the merits of the departed saints. H.
↑ 42लाइसेंस: Notes by Fr. George Leo Haydock (1774–1849), from the Douay-Rheims Bible with Haydock's commentary (first ed. Thomas Haydock, Manchester/Dublin, 1811–1814; New York: Edward Dunigan & Brother, 1859); New Testament notes compiled with Fr. Benedict Rayment. Public domain. Digital text: "The Haydock Bible", Internet Archive (archive.org/details/TheHaydockBible), uploaded 2011 under the Public Domain Mark. · आभार और लाइसेंस